शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

जब कोयला मजदूर सप्ताह में एक दिन सूर्य के दर्शन कर पाते थे

कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण का सबसे ज्यादा लाभ क्या हुआ? यदि इस सवाल का एक ही जबाव देना हो तो मैं तो यहीं कहूंगा कि बेइंतहा शोषण के शिकार कोयला मजदूरों को इससे मुक्ति मिल गई। अब वे बंधुआ मजदूर नहीं रह गए। इसके अलावा कोयला उद्योग में जो भी बदलाव आए, उन्हें राष्ट्रीयकरण से पहले विद्यमान परिस्थितियों का परिमार्जित रूप ही कहा जा सकता है। जैसे, भ्रष्ट्राचार पहले भी था, अब भी है। खान सुरक्षा से पहले भी खिलवाड़ किया जाता था, अब भी किया जाता है। आदि। फर्क इतना हुआ कि इनके रूप बदल गए हैं।
बात पहले राष्ट्रीयकरण से पूर्व कोयला मजदूरों की स्थिति की। नई पीढ़ी के कम ही लोगों को यह मालूम होगा कि साठ के दशक तक ज्यादातर कोलियरियों के कोयला मजदूरों को सोमवार से शनिवार तक यानी छह दिनों तक लगातार खान के भीतर रह कर ही काम करना पड़ता था। तब खान के भीतक महिलाओं के काम करने पर पाबंदी नहीं थी। इसलिए महिलाओं को भी अपने बाल-बच्चों के साथ खान में ही रहकर काम करना पड़ता था। वे केवल रविवार को सूर्य के दर्शन कर पाते थे।
ऐसा नहीं है कि सपरिवार जान हथेली पर रखकर काम करने के एवज में इन मजदूरों को अतिरिक्त लाभ होता था। यह तुगलकी फरमान इसलिए थी कि शोषण के चक्की में पिस रहे मजदूर कहीं अपने "देस" भाग न जाएं। इसलिए प्रत्येक रविवार को खान से बाहर निकले मजदूरों पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी। मजदूर आज की तरह संगठित होते हुए भी शोषण के शिकार इसलिए थे कि उनके तथाकथित नेता खान मालिकों के हाथों बिके हुए थे। इसलिए चंद ईमानदार मजदूर नेताओं की आवाज सभी मजदूरों की आवाज नहीं बन पाती थी। इसका लाभ खान मालिकों को यह था कि प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाने वाले मजदूरों को खान के भीतर ही जुबान खोलने का खामियाजा भुगत लेना पड़ता था। यह खबर खान के बाहर तक इस रूप में आती थी कि फलां मजदूर दुर्धटना में मारा गया। लेकिन केस-मुकदमा इसलिए नहीं हो पाता था कि खानों के भीतर काम करने वाले मजदूरों के नाम और रजिस्टर में उल्लिखित मजदूरों के नाम अलग-अलग होते थे। यानी कि जिस मजदूर को दुर्घटना का शिकार बताया जाता था, कोलियरी के रजिस्टर में उसका नाम ही नहीं होता था।
जिन कोलियरियों के मजदूरों को खान के बाहर रहने की आजादी थी, उन्हें अलग-नामों से बनाए गए कैंपों में रखा जाता था। जैसे गोरखपुरिया कैंप। इस कैंप में गोरखपुर के मजदूरों को रखा जाता था। इन कैंपों में रहना और जीते जी नरक भोगना दोनों बराबर था। कैंपों के प्रभारी आमतौर पर रक्तपिपासु पहलवान होते थे। नतीजतन मजदूरों की थोड़ी सी गलती उनकी मौत का कारण बन जाती थी। उन दिनों सूदखोरी और शराबखोरी भी चरम पर थी। कोयला उद्योग में पांव जमाए बैठे माफिया गिरोह भोले-भाले कोयला मजदूरों को गुमराह करके उनमें शराब की लत लगाते थे। फिर इस नए शौक को पूरा करने के लिए सूद पर धन उपलब्ध कराते थे। और यहीं से कोयला मजदूरों के अंतहीन शोषण का सिलसिला शुरू हो जाता था। (जारी)