गुरुवार, 3 जुलाई 2008

कोयला उद्योग के लिए धन का टोंटा

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
ऊर्जा के मामले में आत्म - निर्भरता के सवाल पर केन्द्र के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की कथनी और करनी में भारी विरोधाभाष है। वह एक तरफ़ तो ऊर्जा के मामले में आत्म- निर्भरता का हवाला देते हुए हर हाल में परमाणु करार पर आमादा है और इसके लिए उसे अपनी कुछ महीनों की आयु वाली सरकार को बलि देने से भी गुरेज नहीं है। दूसरी तरफ़ वह सरकारी क्षेत्र के कोयला उद्योग के लिए पर्याप्त धन नही उपलब्ध करा पा रही है। सरकारी क्षेत्र के कोयला उद्योग के लिए भारत सरकार के खजाने में ज्यादा धन नहीं है। इसका बुरा असर कोयला उद्योग पर देखा जा सकता है।
सरकारी क्षेत्र के कोयला उद्योग के लिए ११ वीं पंचवर्षीय योजना हेतु कोयला मंत्रालय द्वारा ७६८५.८७ करोड़ रुपये की मांग की गयी थी, इसके विरूद्ध मात्र १३१५.९५ करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। कोयला मंत्रालय ने भी हद कर दी। कहाँ तो उसे चालू योजना अवधि के लिए आवंटन से पॉँच गुणा ज्यादा धन चाहिए था और दूसरी तरफ़ वह एक साल के लिए आवंटित २५० करोड़ रुपये भी खर्च नहीं कर पाया।
इन दोनों ही उदाहरणों से अस्पष्ट है कि ऊर्जा के मामले में आत्म-निर्भरता के सवाल पर केन्द्र सरकार कि चिंता महज दिखावा है और परमाणु करार के लिए बेकरारी की वजह कुछ और है। वरना जिस कोयला उद्योग से देश की कुल ऊर्जा की ६७ फीसदी जरूरतें पूरी होती हों, उस कोयला उद्योग के मामले में सरकार इतनी लापरवाह नही बनी रहती। सरकार के इस रवैये से सरकारी क्षेत्र का कोयला उद्योग भारी संकट में है।
परमाणु करार के सन्दर्भ में एक आंकडा कबीले गौर है। पूर्व वित्त मंत्री श्री यशवंत सिन्हा के मुताबिक कोयला आधारित बिजली घर स्थापित करने में प्रति मेगावाट ४.५ करोड़ रुपये की लागत आती है, जबकि आयातित परमाणु रिएक्टर वाले बिजली घर की स्थापना में लगभग प्रति मेगावाट लगभग १० करोड़ रुपये की लागत आती है।

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