वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र ने झारखंड के मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन पत्र लिखा है। उन्हें जीवन में पहली बार निहायत ही व्यक्तिगत काम से किसी राजनेता को पत्र लिखना पड़ा है। विगत चार वर्षों से अपने उपन्यास के बिल का भुगतान नहीं मिलने से परेशान सतीश बाबू ने थक-हारकर यह कदम उठाया है। वे कहते हैं- शारीरिक रूप से कमजोर हो जाने के कारण ऐसी स्थिति नहीं रही कि भाग-दौड़ की जा सके। वैसे भी पिछले चार सालों में अनवरत भाग-दौड़ का कोई लाभ नहीं मिला। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस झारखंड राज्य के गठन की लड़ाई में मेरी भी भूमिका रही और झारखंड के नेताओं को मैंने इतना प्रमोट किया, उसी राज्य में मुझे इस तरह सरकार की बेरूखी झेलनी होगी।
यहां उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने पत्र लिखकर पत्रकार श्री सतीशचंद्र के उपन्यास अपना देश की पांच सौ प्रतियां राज्य के राज्य पुस्तकालयों के माध्यम से खरीदी थी। लेकिन कुल 63 हजार रूपए के बिल का भुगतान चार साल बाद भी नहीं किया गया है। लगातार बीमार चल रहे इस बुजुर्ग पत्रकार ने बिल के भुगतान के लिए कितनी कोशिशें की, पर सब बेकार गया। अशर्फी की लूट, कोयले पे छापा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है झारखंड में।
श्री सतीशचंद्र ने मुख्यमंत्री को जो पत्र भेजा है, उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।
सेवा में,
श्री शिबू सोरेन
माननीय मुख्यमंत्री
झारखंड सरकार
रांची।
विषय: शिक्षा विभाग मेरे उपन्यास से संबंधित बिल का भुगतान नहीं कर रहा है।
महोदय,
झारखंड के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने अपने पत्रांक 794, दिनांक 13 दिसंबर 2004 के तहत मेरे द्वारा लिखित औऱ प्रकाशित उपन्यास "अपना देश" की पांच सौ प्रतियों को राज्य के 16 पुस्तकालयों में आपूर्ति करने का आदेश दिया था। उस पत्र में कहा गया था कि उपन्यास की आपूर्त्ति करने के बाद प्राप्ति रसीदों के साथ बिल माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में जमा करवा दें। ताकि बिल का त्वरित भुगतान किया जा सके।
मैंने ऐसा ही किया। कुल 63 हजार रूपए का बिल प्राप्ति रसीदों के साथ जमा करवा दिया। लंबे समय बाद जब बिल का भुगतान नहीं हुआ तो मामले की तहकीकात करवाई। पता चला कि फाइल में प्राप्ति रसीदें नहीं हैं। कायदे से इस बात के लिए संबंधित अधिकारी को जिम्मवार ठहराते हुए उनसे इस मामले में तलब किया जाना चाहिए था। परन्तु ऐसा नहीं करके मुझे आदेश दिया गया कि पुस्तकालयों से फिर से प्राप्ति रसीदें हासिल करके उन्हें नए बिल के साथ जमा करा दें। चेक या ड़्राफ्ट तो पहले से बना हुआ है, उसका भुगतान कर दिया जाएगा।
जब यह आदेश दिया गया था उस वक्त संभवत: श्री अविनाश कुमार निदेशक थे। दोबारा प्राप्ति रसीदें हासिल करने का अनुभव बड़ा ही कड़वा रहा। फिर भी जितना बन पड़ा प्राप्ति रसीदों के साथ नया बिल माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में जमा करवा दिया। बावजूद इसके बिल का भुगतान नहीं किया जा रहा है।
श्री अविनाथ कुमार के बाद जब मणिकांत आजाद माध्यमिक शिक्षा निदेशक थे तो वह व्यक्तिगत रूप से रूचि लेकर बिल का भुगतान करवाना चाहते थे। उन्होंने मेरे मामले को लेकर मातहत अधिकारियों को काफी फटकार भी लगाई थी। लेकिन उनका वहां से तबादला हो गया और मेरा मामला जहां का तहां लंबित रह गया।
कुछ दिन पहले उस बिल के बारे में जानकारी चाही तो किसी कर्मचारी ने बताया कि फाइल में प्राप्ति रसीदें हैं ही नहीं, फिर बिल का भुगतान कैसे होगा? मुझे पता नहीं कि इस बात में कितनी सच्चाई है।
मैं 85 वर्ष का रोगग्रस्त पत्रकार हूं। शरीर साथ नहीं दे रहा है औऱ बिल के लिए अब भाग-दौड़ करने की स्थिति नहीं है।
आपसे आग्रह है कि इस मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करके मेरे बिल का भुगतान करवा दीजिए। मुझ बहुत सहारा मिल जाएगा। इस कृपा के लिए मैं आपका आभारी रहूंगा।
सधन्यवाद।
विश्वासभाजन,
सतीशचंद्र
पत्रकार तथा साहित्यकार
Tuesday, October 14, 2008
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