शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

भ्रष्टाचार में डूबी झारखंड सरकार और बुजुर्ग पत्रकार सतीशचंद्र की पीड़ा

किशोर कुमार

घोर अव्यवस्था की शिकार और भ्रष्टाचार में आकंड डूबी रही झाऱखंड सरकार ने राज्य के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र को भी नहीं बख्शा। सत्ता में चाहे राजग की सरकार रही हो या यूपीए की, किसी ने बीते चार वर्षों में इस बुजुर्ग पत्रकार को राहत नहीं दिलाई। इसके उलट उन्हें तरह-तरह से परेशान करने का ही काम किया गया।
पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करते हुए व्यवस्था के खिलाफ कोई पचास दशकों तक अपनी आवाज मुखर करने वाले सतीशचंद्र इस सड़ी-गली व्यवस्था के शिकार तब बने, जब सन् 2004 में झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के आग्रह पर राज्य सरकार के पुस्तकालयों में अपनी चर्चित पुस्तक अपना देश की पांच सौ प्रतियों की आपूर्त्ति कर दी। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के संबंधित अधिकारी ने श्री सतीशचंद्र को लिखे अपने पत्र में कहा था कि वे पत्र में उल्लिखित राज्य पुस्तकालयों को बताई गई संख्या के मुताबिक अपनी पुस्तकों की आपूर्त्ति सीधे तौर पर कर दें और बिल निदेशालय को भेज दें।
श्री सतीशचंद्र ने ऐसा ही किया। उन्होंने कूरियर के माध्यम से अपनी पुस्तकें पुस्तकालयों को भेज दी और पावती रशीद के साथ बिल निदेशालय में जमा करवा दिया। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी जब बिल का भुगतान नहीं हुआ तो उन्होंने इसकी चर्चा इस लेखक से की। इसके बाद से अनेक पत्रकार इस मामले में रांची स्थित माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में गए। घंटों खड़े रहने पर भी सिर ऊपर की ओर नहीं उठाने वाले कलर्कों और अधिकारियों को झेला। कम से कम चार बार कहा गया कि बाद में आइएगा। अभी फुर्सत नहीं है। चौदह महीने बीत जाने पर बड़ी आरजू मिन्नतों के बाद एक अधिकारी का दिल पसीजा तो उन्होंने इतना भर बताया कि चेक तो बन गया था, लेकिन फाइल में पुस्तकालयों की पावती रसीदें नहीं होने के कारण चेक को डिस्पैच करना संभव नहीं हो सका है।
अनेक राज्य सरकारों से लेकर भारत सरकार तक के विभागों में प्रावधान यह है कि लेखकों से पुस्तकों में केंद्रीयकृत खरीददारी करके विभागीय स्तर पर उन्हें संबंधित पुस्तकालयों मे भेजा जाता है। लेकिन झारखंड सरकार ने एक अतिरिक्त काम से बचने के लिए नयाब तरीका निकाल रखा है। खैर, श्री सतीशचंद्र के शिष्य पत्रकारों ने चिलचिलाती धूप में पलामू से चतरा तक धूल फांकते हुए पुस्तकालयों से फिर से पावती रसीदें हासिल की। हालांकि यह काम काफी टेढ़ा था। जिस किसी पुस्तकालय से दोबारा पावती रसीद की मांग की गई, पुस्तकालयाध्यक्षों ने यह कहते हुए डुप्लीकेट पावती रसीद जारी करने में आनाकानी की कि यह उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है। डीसी साहब आदेश देंगे तभी वे डुप्लीकेट रसीद दे पाएंगे। काफी मान-मनौव्वल करने पर ही डुप्लीकेट रसीदें हासिल करना संभव हो सका था।
उन सभी पावती रसीदों को श्री सतीशचंद्र के पत्र के साथ माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में जमा करवा दिया गया। संबंधित अधिकारियों ने कहा कि अब जल्दी ही बिल का भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन वह घड़ी आज तक नहीं आई है। तीन महीने पहले जब उक्त बिल की खोजबीन फिर से की गई तो एक अधिकारी ने वही पुराना रोना रो दिया कि फाइल में पावती रसीदें तो हैं ही नहीं। बिल का भुगतान कैसे होगा? अब समस्या यह है कि तीसरी बार पावती रसीदें कैसे हासिल की जाए। दो बार में ही तो सारा तेल निकल चुका है।
यह एक बात बताना लाजिमी होगा कि पिछले चार सालों में मात्र एक ही अधिकारी माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में संवेदनशील दिखा, जिसने अपने मातहत अधिकारियों को लिखित निर्देश दिया कि वे बिल का भुगतान अविलंब करें। उस अधिकारी का नाम है मणिकांत आजाद। इस भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ने मिलने गए पत्रकारों से कहा कि वह खुद भी साहित्यकार हैं और एक ईमानदार पत्रकार और साहित्यकार के दर्द को समझ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह इस पूरे घटनाक्रम से काफी दुखी हैं। मुझे लगता है कि श्री आजाद अपने पद पर कुछ दिन और बने रह गए होते तो शायद बिल का भुगतान हो जाता। लेकिन दुर्भाग्य से उनका जल्दी ही तबादला हो गया और उनके मातहत अधिकारियों ने फिर से फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
झारखंड मे करोड़ों का वारा-न्यारा आम बात है। लेकिन एक मेहनतकश पत्रकार को महज 63 हजार रूपए के भुगतान बड़े कानूनी पेंच हैं। पच्चासी वर्षीय इस पत्रकार को ऐसे समय में झारखंड सरकार की लालफीताशाही का शिकार होना पड़ रहा है, जब वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं। पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करते हुए साहित्य सर्जना और उत्तरी छोटानागपुर के विकास के लिए अनवरत लंबी लड़ाइयां लड़ने वाले सतीश बाबू उम्र के इस पड़ाव पर थक गए हैं। इस बीच उनके साथ दो-दो घटनाएं हुईं हैं। वह एक बार गंभीर रूप से बीमार हुए और काफी टूट गए। दूसरी बार घर में गिर पड़े थे, जिससे उन्हें काफी चोटें आई थीं। परिणाम यह हुआ कि 85 साल की उम्र में भी सक्रिय रहने वाले सतीश बाबू के लिए पिछले कुछ दिनों से घर से बाहर नहीं निकलने की मजबूरी हो गई है।
लंबे समय तक संवेदनहीन राजनीतिज्ञों के हाथों में सत्ता की बागडोर होने के कारण अफसरशाही भी कितनी असंवेदनशील हो गई है, इसका जीता-जागता उदाहरण माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में देखने को मिला। एक अधिकारी ने मुस्कुराते हुए यह कहने की हिम्मत की कि व्यवस्था के विरूद्ध लिखकर सहयोग की अपेक्षा करना बड़ी भूल है। प्रतिरोध करने पर वहां उपस्थित बाकी अधिकारी करने लगे कि ये बाहरी आदमी हैं। इनकी बातों से उन्हें लेना-देना नहीं। सवाल है कि वह बाहरी आदमी था तो निदेशालय में किस लिए था और उसे पुस्तक के कंटेंट के बारे में कैसे जानकारी थी?
इस बात की तह मे जाए बिना इतना तो कहा ही जा सकता है कि सरकार में बैठे लोग अपना देश पुस्तक के कंटेंट को नहीं पचा पाए और नीचे के मुलाजिम आदतन रिश्वत के चक्कर में फाइलों से रिकार्ड गायब कर-करके बुजुर्ग पत्रकार को परेशान करते रहे हैं। वैसे तो इस पुस्तक में देश की व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है। लेकिन पुस्तक का कंटेंट ऐसा है कि झारखंड के भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को भी उसमें अपना चेहरा नजर आता है।
श्री सतीश चंद्र ने 1947 मे झारखंड की धरती पर कदम रखा था। तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। उन्होंने इंडियन नेशन और आर्यावर्त अखबारों में नौकरी की और धनबाद में आवाज नामक साप्ताहिक अखबार निकाल रहे श्री ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के साथ मिलकर उसे दैनिक अखबार का स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने सन् 1982 में आवाज से अलग होकर जनमत नामक दैनिक अखबार निकाला। इस बीच पच्चास वर्षों के अपने पत्रकारीय जीवन में उन्होंने देश के शायद ही किसी पत्र-पत्रिका में नहीं लिखा हो। उनका मजदूर आंदोलन से भी नजदीकी रिश्ता था। कांतिभाई मेहता के साथ काफी काम किया। उनकी साहित्यिक कृतियों में कोयला मजदूरों की जिंदगी पर अनुसंधानपरक और मार्मिक उपन्यास वन पाथर और काली माटी को सर्वाधिक सराहा गया। झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन के आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। सतीश बाबू ने ही पहली बार दिनमान साप्ताहिक पत्रिका में शिबू सोरेन पर स्टोरी की थी। अब जबकि श्री शिबू सोरेन सत्ता में हैं, सतीश बाबू को भरोसा है कि वह उनके साथ न्याय करेंगे। पर देखना है कि नौकरशाही जीतती है या दिशम गुरू यानी मुख्यमंत्री शिबू सोरेन।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-ष्भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थानष् (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in