गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

सतीशचंद्र को परेशान करने की वजह कहीं यही तो नहीं!

झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय द्वारा धनबाद के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र को परेशान किए जाने संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद बड़ी संख्या में पाठकों ने मेल भेजकर जहां इस प्रयास की सराहना की है, वहीं आग्रह भी किया कि इस बात को भी सामने लाया जाना चाहिए कि धनबाद के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र द्वारा सन् 2002 में लिखे गए उपन्यास की पृष्ठभूमि क्या है औऱ उस उपन्यास कौन-कौन से प्रसंग हैं, जिनसे झारखंड सरकार को संचालित करने वाले नेता और नौकरशाह नाराज हो सकते हैं। पाठकों की मांग को ध्यान में रखकर मैं उपन्यास लिखने की पृष्ठभूमि और उस उपन्यास के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूं।

धनबाद के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र ने सन् 2002 में अपना देश नामक उपन्यास लिखा था। उसकी पृष्ठभूमि देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हालात है। श्री सतीशचंद्र ने आजादी की लड़ाइयों को नजदीक से देखा है तो देश के कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण से पूर्व कोयला मजदूरों को जीते जी नरक भोगते भी देखा। यही वजह है कि संवेदनशील पत्रकार सतीश बाबू ने पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करते हुए सामाजिक सरोकारों के लिए सड़क पर उतरने का भी काम किया।
इस बुजर्ग पत्रकार को यह बात काफी कचोटती थी कि स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम महासंग्राम में भाग लेने वाली उनकी पीढ़ी के लोगों ने जो सपने देखे थे, वे धूमिल होते जा रहे हैं। सतीश बाबू कहते हैं - "हमारा देश 1947 मे आजाद हुआ था और उसके एक साल बाद चीन सामंतवाद के चंगुल से मुक्त हुआ था। चीन के मामले में भारत वर्षों बड़े भाई की भूमिका निभाता रहा। जवाहरलाल नेहरू ने 1957 में चीन को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलाने के लिए भारत के दावे को दरकिनार कर दिया था। इस तरह चीन अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आसीन हो पाया था। भारत मे जब कारें बन रही थी और लोग उस पर चलने लगे थे तो उस दौरान चीन के नेता साइकिल पर चलते थे।
बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक तक भारत हर क्षेत्र में चीन से आगे था। लेकिन आठवें दशक से तस्वीरें इस तरह बदलती गईं कि चीन ने भारत को काफी पीछे छोड़ दिया है। यदि समाचार पत्रों की मानें तो आज चीन में कोई भूखे पेट सोने को मजबूर नहीं है, जबकि भारत में अभी भी कम से कम पच्चीस फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीने को विवश हैं। ऐसा क्यों हुआ?" इन्हीं सवालों पर चिंतन-मनन करते हुए श्री सतीशचंद्र ने अपने आसपास जो देखा-सुना, उन्हें काल्पनिक पात्रों के जरिए रेखांकित करने की कोशिश की है।
इस उपन्यास के मुख्यरूप से दो पात्र हैं-माधव और भारती। माधव काफी संघर्ष करके पढ़-लिखकर आईएएस बने व्यक्ति है, जो यहां की राजनीति से त्रस्त होकर लंदन चला जाता है औऱ वहीं नौकरी करता है। भारती भारतीय मूल की महिला है, जिसके माता-पिता भारत में आपातकाल के दौरान सरकारी दमन से त्रस्त होकर लंदन चले गए थे और भारती का जन्म विदेश जाने के रास्ते में ही हुआ था। लंदन में ही माधव औऱ भारती की शादी हुई थी।

अपने पिता की बीमारी की खबर सुनकर माधव भारती के साथ भारत आते हैं और उसके बाद उन्हें किन-किन परिस्थियों का सामना करना पड़ता है औऱ विदेश जाने के पूर्व आईएएस अधिकारी के रूप में किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, उन्हीं बातों के जरिए बताने की कोशिश की गई है कि भारत चीन से पीछे कैसे हो गया।

रिपोर्ताज शैली में लिखे गए इस उपन्यास मे कुल पंद्रह अध्याय हैं - बंगाल बंद-बिहार जाम, बिहार बनेगा गोबरिस्तान, आईएएस मान-मर्दन, चना-चबेना गंगाजल, नेताजी ही नेताजी, अंधा बांटे रेवड़ी, शासन बदला - समाज नहीं बदला, लंका के राक्षस हैं माफिया, दक्षिण का बदलता स्वरूप, पेंशन का सच, बदलता राजनीतिक परिवेश, दिल्ली के दलाल, गरीबी नहीं भ्रष्टाचार है, महाकुंभ और अपना देश।

यहां प्रस्तुत उपन्यास के कुछ रोचक अंशों से उपन्यास के बारे में समझने में मदद मिलेगी और साथ ही लगेगा भी कि झारखंड की राजग से लेकर यूपीए तक की सरकारें इस बुजुर्ग पत्रकार से इसलिए नाराज हो सकती है।

"माधव आईएएस अधिकारी था और राज्य में चुनाव के बाद नई सरकार के एक दबंग मंत्री का सचिव नियुक्त हो गया था। उसने अपने मंत्री के लिए किसी मामले में एक नोट तैयार किया और उससे संबंधित फाइल मंत्री जी को देते हुए कहा - "सर, नोट है, दस्तखत कर दीजिएगा।" नोट की बात सुनते ही मंत्री जी की बांछे खिल गई। ठीक ही लोग कहते हैं कि मंत्री के यहां नोटों की वर्षा होती है। मंत्री जी ने झट से दरवाजा बंद किया और पूरी फाइल उलट-पुलट गए। फिर माधव के मुंह पर फाइल फेंकते हुए कहा - हमीं को ठगते हो। हम बड़े-बड़ों का ......फाड़ चुके हैं औऱ तुम तो कलमघिस्सु किरानी हो। कहां है नोट? नोट अपनी गाड़ी में रखकर कागज हमारे सामने रख दिया। हमको इतना बुड़बक समझते हो?" ( राजग के शासनकाल में झारखंड के एक मंत्री के बारे में लोग इसी तरह की बात करके चुटकियां लेते थें।) हालांकि लेखक ने अपने उपन्यास में इस प्रसंग के साथ एक बात जोड़ी कि इस घटना से माधव इतना मर्माहत हुआ कि नौकरी से इस्तीफा दे दिया। {वास्तविक जीवन में इस तरह मर्माहत होकर इस्तीफा देने वाले गिने-चुने ही होते हैं। मुझे याद नहीं है कि झारखंड में ऐसी कोई घटना घटी।)

"आईएएस से नाता तोड़ने के बाद लंदन बस गए माधव अपने पिता की बीमारी की खबर सुनकर भारती के साथ लंदन से कलकत्ता एयरपोर्ट तो पहुंच गया। लेकिन बंगाल बंद के कारण सड़क या रेल मार्ग से बिहार के अपने गांव तक जाना लगभग नामुमकिन था। सीपीएम ने बंद करवाया था। इसलिए बंद पूर्ण रूप से सफल था। बावजूद इसके एक एंबुलेंस वाले ने माधव और भारती को बिहार तक पहुंचा दिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि वह खुद भी सीपीएम का कार्यकर्त्ता था और बंद कराने उतरे युवाओं से उसकी सेटिंग थी। ड्राइवर मुट्ठी गर्म करता गया और आसानी से रास्ता पार करता गया। बिहार में सड़क जाम के दौरान यही नुस्खा काम आया। रास्ते में यह सब देखकर माधव के चेहरे पर उभरे आश्चर्य के भाव को पढ़ते हुए ड्राईवर ने अपनी चतुराई का बखान करते हुए कहा - "सब सेट किया हुआ है। देखिएगा, ये लोग कहीं रोक-टोक नहीं करेंगे।" ( राजग के बाद गठित राज्य की यूपीए सरकार को भला यह कैसे गंवारा होता, वह भी तब जबकि उस समय सीपीआई यूपीए का घटक दल थी ?)

"माधव अपने पिता के निधन के बाद पूरी संपत्ति ट्रस्ट के नाम करके एक मंदिर बनवाना चहता था। ऐसा वह अपने पिता की सहयोगी चंपा के कहने पर करना चाहता था। लेकिन भारती मंदिर का नाम सुनते ही भड़क गई। कहने लगी - " लंदन के अखबारों में पढ़ती रही हूं कि भारत में सबसे ज्यादा दंगा-फसाद मंदिर-मस्जिद के नाम पर ही होता है। देश को मंदिर से ज्यादा शिक्षा की जरूरत है औऱ ट्रस्ट के द्वारा स्कूल ही खोला जाना चाहिए।" ( जरा सोचिए, राजग सरकार इन बातों को भला कैसे पचा पाती)

झारखँड में विकास के नाम पर लूट, रिश्वतखोरी, राजनीतिज्ञों की स्वार्थपरता औऱ बेलगाम नौकरशाही की बात अब आम है। उपन्यास में झाऱखंड का नाम नहीं है, लेकिन जगह-जगह जो वर्णन हैं, वे झारखंड घटित घटनाओं से मेल खाते हैं। मसलन,
"माधव ट्रस्ट की रजिस्ट्री के लिए रजिस्टार के कार्यालय में गया तो उसे इस बात का अहसास हुआ कि उदारीकरण का असर दिल्ली के सरकारी कार्यालयों मे भले ही हो, जिला और प्रखंड स्तर के कार्यालयों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि घूस का रेट ज्यादा हो गया है। जरूरतमंदों को अधिक परेशान करने की मानसिकता बढ़ गई है। ताकि लोग मुंहमांगी रिश्वत दे दें। माधव का आईएएस वाला रौब सिर चढ़कर बोलने लगा। वह उस दफ्तर के बड़े अधिकारी से शिकायत करना चाहता था। लेकिन बड़े अधिकारी तो बड़े अधिकारी ठहरे। वह बिना छुट्टी लिए और बिना किसी दफ्तरी कार्य के आफिस से बाहर थे। पूछने पर उनके कलर्क ने कहा - "साहब हैं, जब मर्जी होगी, दफ्तर आ जाएंगे।"
एक अन्य प्रसंग में एक व्यक्ति अधिकारी से वार्तालाप के दौरान कह रहा है- " सरकार के दो स्तंभों में तो घुन लग गया। विधायिका पर दलालों और अपराधियों का कब्जा है, कार्यपालिका भी इससे अछूता नहीं। अपनी छाती पर हाथ रखकर बोलिए, आप में अब कितने रीढ़ वाले रह गए हैं? वैसे हमारी जानकारी के अनुसार ज्यादा अफसरों ने अपनी रीढ़ नीलाम कर बंगले बनवा लिए हैं, फार्म हाऊस बनवा लिए हैं, देश और विदेश के बैंकों में बेनामी खातों में करोड़ों-करोड़ रूपए जमा कर रखे हैं। जाहिल, चपाट नेताओं और राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय दलालों ने उनकी रीढ़ें ढ़ीली कर दी है।"


"माधव भारती के साथ पटना चले गए। पिता जी के मित्र नेताजी राज्य की कमान संभाले हुए थे। माधव ने सोचा था कि एक बार उनसे भी मिल लिया जाए। पटना में मुलाकात हो भी गई। नेताजी ने भारती से पूछ दिया, पटना कैसा लगा? भारती ने छूटते ही कहा- "मच्छरों ने परेशान कर दिया है। होटल वाले से शिकायत की तो कहा कि चारो ओर खटाल ही खटाल है। कितना मच्छर भगाएं? "

नेताजी झट बोल पड़े - देखिए, सबकी खोपड़ी उलट गई है। आप ही नहीं, दूसरे सफेदपोश लोग भी शिकायत करते हैं कि पटने मे खटाल बहुत हैं। अदालत ने भी कहा, खटाल शहर से बाहर करो। यह सरकार की उपलब्धियों को कम करके आंकने के समान है, जबकि खटालों की बढ़ती संख्या बिहार की समृद्धि का परिचायक है। दूध-दही कौन खाता है, अमीर ही ना? अब बिहार में अमीरी बढ़ रही है तो खटाल कैसे कम होंगे, बताइए?

रही बात मच्छरों की तो इन मच्छरों के कारण ही तो बिहारी जवान घर छोड़कर पंजाब भागते हैं, दिल्ली भागते हैं और वहां से हर महीने हजार-हजार रूपए मनिआर्डर भेजते हैं, जिसके बल पर गंवई बाजार में लोग अंगूर खाते हैं। पहले बिहारी लोगों को घरघूसन कहा जाता था। जब से राज्य में मच्छर बढ़ा है, उसके डर से बिहारी लड़के बाहर भागने लगे हैं।" नेता जी ने आगे जोड़ा - "आपको मालूम है कि अपने गांधी जी भी अपनी कुटिया में बकरी रखते थे। अरे, जानवर के बिना भला आदमी कहीं आदमी बना रह सकता है?" भारती ने हार मान ली। कहा - गजब का आदमी है, बात में इससे पार नहीं पाया जा सकता।" ( इस वार्तालाप से सब कुछ स्पष्ट है। झारखंड में अठारह महीने एक ऐसी सरकार रही, जिसके बारे में कहा जाता है कि बिहार रूट से दिल्ली गए नेता संचालित करते रहे। यदि इस बात में सच्चाई हो तो झारखंड की उस सरकार की नाराजगी समझी जा सकती है।)

उपन्यास में इस तरह के पच्चास से ज्यादा प्रसंग हैं।

यहां उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने पत्र लिखकर पत्रकार श्री सतीशचंद्र के उपन्यास अपना देश की पांच सौ प्रतियां राज्य के राज्य पुस्तकालयों के माध्यम से खरीदी थी। लेकिन कुल 63 हजार रूपए के बिल का भुगतान चार साल बाद भी नहीं किया गया है। लगातार बीमार चल रहे इस बुजुर्ग पत्रकार ने बिल के भुगतान के लिए कितनी कोशिशें की, पर सब बेकार गया। अशर्फी की लूट, कोयले पे छापा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है झारखंड में।

1 टिप्पणी:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

upanyas wakai men achcha hoga, main bhi padhna chahoonga, wajah bhi yahi hogi